Sunday, September 9, 2012

.अरे मानव तु कितना नादान !

अरे  मानव ! तु कितना नादान
क्षणिक संसारका रसपान
कर बैठा है, पिछे देखो
नस्वर है ये तो हे अन्जान !

तेरे मन्मे है ये सब मेरा
ये तो है दो दिनका डेरा
जब देर चुकी होगी समझमे
सब तोड़ेंगे प्रिय जन घेरा !

दारा स्वजन और पुत्र कलत्र
तुम छोडोगे इधर अलपत्र
साथ रहेगा दो गज धर्ति
शरीर लिपटति छादन बस्त्र

जितना भोग यहा चरम सुखकी
प्राप्त किए हो  अधर्ममुखकी
निश्चित है बो लम्बा मार्ग
सेवन करना है निहित दुखकी

जानबूझ कर जो पर ताडन करे
बिनु प्रायस्चित्त असहज मे मरे
कल्प कल्प नरक मे गिरजाता है
मोक्ष कि बात तो दूर रहे !

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