Sunday, October 7, 2012

प्रस्फुटन !

धर्ति अलग न रही पबनसे,
अलग न   रही नीर
सीता अलग न रहसकी रामसे,
काननकपि मथलियो क्षीर !
आत्मा मिल जाती है परमात्मासे,
है निश्चित पर अति दूर !
मिट जाना इक रोज अबश्यम्भाबी है,
मृगतृष्णा सुखसागरकी त्यागो धीर !

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